गिल्ली डंडा हजारों वर्षों से भारतीय उपमहाद्वीप का एक प्राचीन पारंपरिक खेल रहा है। इसकी उत्पत्ति के संबंध में विद्वानों क...
गिल्ली डंडा हजारों वर्षों से भारतीय उपमहाद्वीप का एक प्राचीन पारंपरिक खेल रहा है। इसकी उत्पत्ति के संबंध में विद्वानों का मत है कि यह खेल वैदिक काल (लगभग 5000 वर्ष पूर्व) से अस्तित्व में है। महाभारत, रामायण आदि ग्रंथों में ऐसे खेलों का उल्लेख मिलता है, जिनमें “डंडा” (लंबी लकड़ी) और “गिल्ली” (छोटी लकड़ी) का प्रयोग किया जाता था। कई इतिहासकार इस खेल की जड़ें सिंधु घाटी सभ्यता तक जोड़ते हैं, जहाँ लकड़ी के छोटे उपकरणों से खेले जाने वाले खेलों के प्रमाण मिले हैं।
मौर्य साम्राज्य (लगभग 322–185 ईसा पूर्व) के समय यह खेल अत्यंत लोकप्रिय था। धीरे-धीरे यह खेल भारत के अलावा नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, अफगानिस्तान, म्यांमार और दक्षिण-पूर्वी एशिया तक फैल गया। माना जाता है कि "सिल्क रुट" से खानाबदोश जैसे "रोमा लोगों" की यात्रा से यह खेल पश्चिमी देशों में पहुँचा ! भारत में यह मुख्यतः ग्रामीण समुदायों और कभी-कभी राजपरिवारों के बीच भी लोकप्रिय रहा।
सांस्कृतिक महत्व
गिल्ली डंडा केवल एक खेल नहीं, बल्कि भारतीय लोक-संस्कृति और परंपराओं का प्रतीक है। यह खेल लोक कथाओं, गीतों, और पुराणों में भी झलकता है। ग्रामीण जीवन की सादगी और उत्सवधर्मिता में गिल्ली डंडा का खेल हमेशा आनंद और एकता का माध्यम रहा है। यह खेल समाज के सभी वर्गों को जोड़ने वाला व सामाजिक बंधनों को मज़बूत करता है!
खेल का स्वरुप
गिल्ली डंडा खेलने के लिए किसी विशेष उपकरण या मैदान की आवश्यकता नहीं होती। केवल एक छोटी लकड़ी (गिल्ली) और एक बड़ी लकड़ी (डंडा) चाहिए। गिल्ली को ज़मीन पर रखकर डंडे से उछालते हुए दूर तक मारना इस खेल का मुख्य उद्देश्य होता है।
स्वास्थ्य लाभ
गिल्ली डंडा शारीरिक व्यायाम का एक सरल माध्यम है। यह शरीर की मांसपेशियों को सक्रिय रखता है, एकाग्रता और त्वरित निर्णय-शक्ति को भी बढ़ाता है। यह खेल “हाथ और आँख” के समन्वय को बेहतर बनाता है तथा खेल भावना और टीमवर्क को भी प्रोत्साहित करता है।
आधुनिक युग में स्थिति
आज के तेजी से बढ़ते शहरीकरण, तकनीकी विकास और व्यस्त जीवनशैली के कारण पारंपरिक भारतीय खेल धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं। बच्चे अब मैदानों के बजाय मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों पर खेलों में व्यस्त रहते हैं। इससे पारंपरिक खेलों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। गिल्ली डंडा भी अब शहरों से लगभग गायब होता जा रहा है। सामाजिक रूप से इसे “गरीबों का खेल” मानकर उपेक्षित कर दिया गया, जबकि यह भारत की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर है।
विश्व में पहचान और विविध नाम
गिल्ली डंडा खेल दुनिया के कई देशों में विभिन्न नामों से खेले जाते हैं :-
इंग्लैंड में टिप कैट /कैट्स पैलेट, ईरान में अलक दोलक, नेपाल में दांडी बियो, बांग्लादेश में दाँगुली, अफ़ग़ानिस्तान में लप्पा डुग्गी, मलेशिया में कोंडा कोंडी, पोलंड में क्लिपा, इटली में लिप्पा, रोमानिया में जुर्का, आयरलैंड में सीड/ क्लीज़ , दक्षिण कोरिया में जाचिंगा, कैमरी द्वीप समूह में बिलार्डा, कम्बोडिया में कोन को, इंडोनेशिया में पाथेल लेले, अमेरिका में पी वी, फिलिपीन्स में स्याटोंग, स्पेन में बिलार्डा, तुर्की में सेलि कोमक, वियतनाम में डान्ह ट्रोँग, क्यूबा में क्विम्बुम्बिया, बर्मा में चियांग सैट, मैक्सिको में चंगारैस, चीन में दा गा गा, स्लोवेनिया में पंडोल्फो, कैटेलोनिआ और वेलेन्सिया में बोलिट, अज़रबैजान में चिलिंगाधाज़, रूस और यूक्रेन में चिज़िक, क्रोएशिया में पिकूचा, न्यूफाउंडलैंड में टिडली , नोर्वे में विप्ले पिन्ने, फ्रांस में बैंटोँनेट, कनाडा में मोइनो, श्रीलंका में गुडू, म्यांमार में चोंग आदि!
भारत में भी यह खेल अलग-अलग नामों से जाना जाता है :-
उत्तर प्रदेश- गिल्ली डंडा, महाराष्ट्र- विटी दांडू, पंजाब-गुल्ली डंडा, गुजरात- टांग गोटी, केरल- कुट्टीयुम कोलुम, बिहार- गुल्ली तान, ओडिशा- गुल्ली बड्डी, कर्नाटक- चिन्नी डुंडु, असम- तांग गुटी, बंगाल- डांगुली, आंध्र प्रदेश- विलम गोड/ कर्रा बिल्ला, बालासोर - गुटी दाबुला, कोंकड़- कोयोँडो बाल, प्राचीन भारत - घटिका, कश्मीर- लाथकीजी लोथ, तमिलनाडु- किट्टी पुल्लू, मेघालय- बेह डाइंग खुन, तेलंगाना- चिर्रा गोनय आदि!
यह विविधता दर्शाती है कि गिल्ली डंडा केवल खेल नहीं, बल्कि भारतीय लोकजीवन की आत्मा है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुनरुत्थान
वर्ष 2017 में “अंतरराष्ट्रीय गिल्ली डंडा महासंघ (Gilli Danda
International Federation – GDIF)” की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य इस खेल को वैश्विक स्तर पर मान्यता देना और नियमित प्रतियोगिताएँ आयोजित करना है।
अक्टूबर 2021 में ग्रेटर नोएडा में पहला राष्ट्रीय गिल्ली डंडा टूर्नामेंट हुआ। इसके बाद अक्टूबर 2024 में भी ग्रेटर नोएडा स्पोर्ट्स स्टेडियम में राष्ट्रीय प्रतियोगिता आयोजित की गई।
साथ ही, एशियन गिल्ली डंडा महासंघ (Asian Gilli
Danda Federation – AGDF) की स्थापना 2017-18 के दौरान
"ईरान" में की गई, जो एशियाई चैंपियनशिप के आयोजन का दायित्व निभा रहा है।
भविष्य में GDIF और AGDF मिलकर विश्व कप और महाद्वीपीय चैंपियनशिप आयोजित करने की योजना बना रहे हैं।
गिल्ली डंडा अब केवल एक लोक खेल नहीं रहा; यह संगठित रूप ले चुका है और "अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँचने की दिशा में अग्रसर है।"
निष्कर्ष
गिल्ली डंडा भारत की परंपरा, सादगी और सामाजिक एकता का प्रतीक है। यह खेल हमें हमारी मिट्टी, संस्कृति और लोकजीवन से जोड़ता है।
आज जब आधुनिक तकनीक हमें एक-दूसरे से दूर कर रही है, ऐसे समय में पारंपरिक खेलों का संरक्षण हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।


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